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आधा हिस्सा : tenali raman story in hindi

tenali raman story in hindi एक बार नृत्य और संगीत का एक प्रसिद्ध कलाकार विजय नगर में आया । महाराज ने रानियों के देखने के लिए नृत्य दिखाए जाने का विशेष प्रबंध किया और सभी को यह आदेश दे दिया कि तेनालीराम को इस सम्बंध में कुछ न बताया जाए ।

इधर, जब तेनालीराम को इस विशेष आयोजन का पता चला तो वे भी राजमहल की ओर चल दिए । किन्तु द्वारपाल ने उन्हें बाहर ही रोक लिया: ”महाराज की आज्ञा है कि आपको भीतर प्रवेश न दिया जाए । क्षमा करें ।”

”किन्तु मुझे पता चला है कि महाराज की ऐसी कोई आज्ञा नहीं है: देखो, तुम भीतर जाने दो । वहां से मुझे जो इनाम मिलेगा, उसमें से आधा तुम्हारा ।” तेनालीराम ने द्वारपाल को लालच दिया । पहले तो द्वारपाल हिचकिचाया, फिर सोचा, ‘यदि बैठे-बिठाए आधा इनाम मिल जाए तो क्या बुराई है ।’

”ठीक है, लेकिन ध्यान रहे, जो कुछ मिलेगा, उसका आधा हिस्सा मैं लूंगा ।” ”ठीक है वादा रहा ।” कहकर वह उस द्वार से भीतर आ गया । अब दूसरा द्वार पार करना था । वहां भी द्वारपाल ने उसे रोका । तब तेनालीराम बोला: ”देखो, मुझे भीतर जाने दो, जो कुछ भी मुझे मिलेगा, उसका आधा हिस्सा तो बाहर का द्वारपाल ले लेगा-बाकी आधा तुम ले लेना ।”

”क्या बाहर वाले द्वारपाल से ऐसी शर्त तय हुई है ?” ”हां भई, तभी तो यहां तक पहुंचा हूं ।” ”ठीक है-मगर अपने कौल से मुकरना मत ।” ”ये तेनालीराम का वादा है भाई-हमारे वादे पर तो महाराज भी विश्वास कर लेते हैं ।” इस प्रकार उसे तसल्ली देकर तेनालीराम भीतर आ गए ।

वहां नाटक मण्डली द्वारा नृत्य और संगीत के माध्यम से कृष्ण की बाल लीला का मंचन हो रहा था । माखन चोरी, गोपियों की छेड़छाड़, सभी कुछ गीतों के माध्यम से प्रस्तुत किया जा रहा था । एक व्यक्ति कृष्ण बना था । अचानक तेनालीराम को न जाने क्या सूझा कि पास ही पड़ा एक डंडा उठाकर कृष्ण बने कलाकार के सिर पर दे मारा ।

दर्द के मारे कलाकार चिल्लाने लगा । ”अरे महाशय! कृष्ण ने तो गोपियों और ग्वालबालों से न जाने कितनी चोटें खाई और उफ तक भी की- आपको भी इस मामूली प्रहार पर नहीं चिल्लाना चाहिए ।” लेकिन कलाकार पर तेनालीराम की बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ा । वह अपना सिर थाम कर ददँ से चिल्लाता रहा ।

ये देखकर महाराज को क्रोध आ गया । उन्होंने तुरन्त एक पुलिस अधिकारी को बुलाकर कहा: ”हमसे लगातार प्रशंसा और उपहार पाकर इसका दिमाग खराब हो गया है । आज इसे कुछ और ही इनाम दिया जाए । हमारी आज्ञा है कि इनाम में इसे दो सौ कोई मोर जाएं ।”

पुलिस अधिकारी ने फौरन तेनालीराम को थाम लिया और चला यातनाग्रह की ओर । ”ठहरिए महाराज! महाराज ने मुझे जो इनाम दिया है वह सिर आखों पर । किन्तु मेरा इनाम कुछ अन्य लोगों को बांट दिया जाए ।” ”क्या मतलब?” महाराज ने भी उसकी बात सुन ली थी: ”कोतवाल साहब! इसे इधर लाओ ।” कोतवाल उसे महाराज के सम्मुख ले गया ।

”अरे मूर्ख! तुझे इनाम में दो सौ कोड़े प्राप्त हुए हैं ।” आश्चर्य से महाराज ने पूछा: ”क्या हमारे राज्य में ऐसा भी मूर्खकोई है जो यह इनाम लेना चाहेगा ?” ”इस प्रकार के दो व्यक्ति तो आपके राजदरबार में ही हैं महाराज!” तेनालीराम ने बताया: ”वे दोनों बाहर के द्वारपाल हैं ।

उन्होंने इसी शर्त पर मुझे अन्दर आने दिया था कि हमें जो कुछ भी पुरस्कार प्राप्त होगा, वे दोनों आधा-आधा बांट लेंगे ।” महाराज ने तुरन्त द्वारपालों को बुलवाया । पूछताछ में तेनालीराम की बात सच निकली । महाराज की आज्ञा से उन लालचियों को न केवल सौ-सौ कोड़े मारे गए बल्कि नौकरी से भी हटा दिया गया ।

”महाराज! हमें इन कलाकारों के साथ-साथ अपने दरबार और राज्य के लालची कलाकारों का भी नाटक-कभी-कभी देखना चाहिए ।” महाराज ने खुश होकर तेनालीराम की पीठ ठोंकी और अपनी बगल में बैठाया । कलाकार पुन: अपनी प्रस्तुति देने लगे ।

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